roti : रेलयात्रियों को ‘नाश्ता’ देने वाले रोटी के लिए तरसे

-रेलगाड़ियों की छुकछुक के साथ चाय-चाय की आवाज भी शांत
-ट्रेनों में फेरी लगाकर सामान बेचने वाले हो गए बेरोजगार
-श्याम मारू-
बीकानेर।
‘चाय…चाय…चाय….‘ रेलगाड़ियों (train)में गूंजने वाली यह आवाज अब शांत है। न रेलों की मधुर छुक-छुक सुनाई दे रही है न चाय-चाय के लयबद्ध स्वर…। 25 मार्च को लाॅक डाउन शुरू होने के बाद रेलगाड़ियों में फेरी लगाकर सामान बेचकर गुजर-बसर करने वालों के समक्ष रोजी-रोटी (roti) का संकट खड़ा हो गया है। शुरुआती दिनों तक तो ज्यादा परेशानी नहीं हुई लेकिन अब रोटी-रोटी (roti) के लिए मोहताज हो गए हैं। चलती ट्रेन में चना-चबीणी, भेल, मुंगफली, पाॅपकाॅर्न, कचैरी-समोसे, कुल्फी, खीरा-टमाटर सलाद, पोहा समेत अनेक खाद्य सामग्रियां बेचने वाले परिवार पालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इनके साथ-साथ पेपर सोप, खिलौने, ताला,जंजीर के फेरीवाले (vendor) भी बेरोजगार हो गए है। परिवार पालने की जद्दोजहद में अब कुछ लोग फल-सब्जी बेचकर गुजारा कर रहे हैं। लॉकडाउन के चलते ट्रेनें क्या बंद हुई इन परिवारों की जिंदगी की गाड़ी ही बेपटरी हो गई। इन परिवारों को उम्मीद है कि लॉकडाउन खुलने के बाद ट्रेनें फिर शुरू होंगी और इनकी जिंदगी फिर रफ्तार पकड़ेगी। बीकानेर में एक तबका ऐसा है जो हर दिन यात्रा करता है। इस यात्रा की मंजिल वही होती है जहां से शुरुआत होती है। लाॅक डाउन में कुछ लोगो को राशन मिला है, कुछ की सामाजिक संस्थाओं ने सहायता की है लेकिन अधिकांश एक वक्त की रोटी (roti) खाकर समय व्यतीत कर रहे हैं। सभी को रेलगाड़ियों की सिटी बजने का इंतजार है।

जहां से सफर शुरू, वही होती मंजिल

लालगढ़ से अर्जुनसर तक हर दिन चना मसाला बेचने वाले गौरी शंकर ने बताया कि हर सुबह वह जल्दी उठकर रात के भिगोए चनों को मसाले में भूनकर तैयार करता। एक टोकरी में कागज, नीम्बू,प्याज मसाला आदि रखकर मजदूरी के लिए सुबह निकल पड़ता। लालगढ़-अबोहर पैसेंजर ट्रेन में सुबह 8.45 बजे रवाना होने के बाद 11 बजे अर्जुनसर पहुंचने तक सामान बेचता और लौटते समय बठिण्डा-लालगढ़ पैसेंजर ट्रेन में बिक्री करता। यह ट्रेन अर्जुनसर से दोपहर 3 बजे रवाना होकर शाम 6.15 बजे तक लालगढ़ पहुंचती है। हर दिन लगभग 800 से 1000 रुपए की दिहाड़ी होने से घरखर्च अच्छी तरह चल रहा था। जब से ट्रेन बंद हुई है, खाने के लाले पड़ गए हैं। कुछ ऐसा ही मोहम्मद फैयाज के साथ हुआ। फैयाज का शिड्यूल फिक्स है। वह हर रोज रणकपुर एक्सप्रेस से नागौर तक जाकर वापसी में भी लौटती रणकपुर एक्सप्रेस से बीकानेर आ जाता। रणकपुर एक्सप्रेस बीकानेर से सुबह 9.30 रवाना होकर 11 बजे नागौर पहुंचती है और वापसी में 12.20 बजे नागौर से रवाना होकर दोपहर 3.30 बजे बीकानेर पहुंचने तक मुरमुरे-भेल की बिक्री से वह लगभग 700 से 900 रुपए तक कमाई कर लेता है। गाड़ियां स्थगित होने के बाद से वह घर में बंद है और कमाई ठप। घर में पांच बच्चे और माता-पिता समेत नौ सदस्य हैं। कुछ समाजसेवियों की ओर से भोजन मिलता है तो गुजारा हो जाता है लेकिन यह रोज नहीं मिलता। घर का राशन और रुपए पहले दस दिन में खत्म हो गए। जिला प्रशासन की तरफ से अभी तक कोई सहायता नहीं मिली।