railway-8 : पुरानी दिल्ली का प्लेटफार्म 16 और 17 का कनेक्शन

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अब ट्रेन की गति धीमी हो गई थी। ट्रेन के दोनो तरफ झूग्गियों की कतार थी। बाहर का नजारा बयान करने लायग नहीं है। पालम के बाद ही शुरू हुआ सिलसिला अब तक जारी था। सुबह सवेरे का समय हर किसी के हाथ में लोहे का डोला (मोबिल आॅयल का खाली डिब्बा) था। झुग्गी-झोंपड़ी के लोग इसका ढक्कन काटकर शौच जाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लोग पटरियों पर बैठे कतारबद्ध खुले मे शौच कर रहे थे। ट्रेन के दोनों तरफ ये ही बेशर्म दृश्य था। भारतीय रेलवे (railway-8) सबसे बड़ा खुला शौचालय बना हुआ था। बदबू से नाक बंद करनी पड़ी। असहनीय होने पर पिताजी ने खिड़की बंद कर दी। मैं शांतचित्त होकर सोचने लगा, सरकार इनके लिए सार्वजनिक शौचालय क्यों नहीं बनवाती। हमारी रेलवे (railway-8) काॅलोनी में तो महिलाओं व पुरूषों के लिए अलग-अलग शौचालय थे। फिर गाड़ी का एक झटका लगा। पुरानी दिल्ली का स्टेशन आ गया। हम सब उतर गए। पिताजी और भाई ने नग गिन-गिनकर उतारे। मैं और बाई सामान के पास खड़े थे। हरिद्वार के लिए गाड़ी सुबह 7.45 बजे थी। अभी लगभग पौन घंटा बाकी था। हम सभी एक बैंच पर बैठ गए। मैं प्लेटफार्म देख रहा था। पुरानी दिल्ली के प्लेटफार्म संख्या 16-17 के बारे में कहा जाता है कि बीकानेर रियासत के महाराजा गंगासिंह जी ने ये दोनों प्लेटफार्म बीकानेर रियासत के लिए खरीद रखे थे। मतलब तत्कालीन बीकानेर महाराजा की ट्रेन जब दिल्ली आती थी तो रेलवे (railway-8) उन्हेें इन प्लेटफार्म पर वरीयता प्रदान करता। इसमें कितनी सच्चाई, कभी पुष्टि करने की कोशिश नहीं की। लेकिन यह किवदंती बीकानेरवासियों के लिए पुरानी दिल्ली में सीना चोड़ा करने के लिए काफी थी। तभी पिताजी चाय ले आए। बाई ने हमें दो-दो खजली दी। मैंने चाय में डुबो-डुबोकर खजली को सेवन शुरू कर दिया। रेलवे (railway-8)स्टेशन की चाय का स्वाद ही अलग था। तब बेईमानी नहीं थी। ताजा दूध, चाय-चीनी से बनी चाय के साथ खजली का मेल वाकई मजेदार था। मैंने और मांग की तो बाई ने सक्करपारे पकड़ा दिए। इसके बाद हमें प्लेटफार्म बदलना पड़ा। जहां से दिल्ली-सहारनुपुर-हरिद्वार एक्सप्रेस से हमें आगे की यात्रा करनी थी। हम इंतजार करने लगे। लगभग 20 से 25 मिनट बाद गाड़ी आ गई। पूरी ट्रेन जनरल थी। भीड़ डिब्बों में घुसने की मशक्कत करने लगी। पिताजी भी दौड़कर एक डिब्बे में चढ़े और जगह रोक ली। कुछ देर बाद हम भी डिब्बे में थे। पिताजी सामान को सीट के नीचे जमाने में व्यस्त हो गए। ट्रेन के चलने का समय होने के कारण अचानक लोगों की आवाजाही तेज हो गई। (क्रमशः)

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