railway-7: छाप छोड़ गया छुक-छुक रेल से भोर का नजारा

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अचानक जब आंख खुली तो रेलगाड़ी अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी। नीचे देखा तो बाई और पिताजी समेत अधिकांश लोग सो रहे थे। मैं नीचे उतरा और चप्पल ढूंढने लगा। नहीं मिलने पर बाई की पगरखियां ही पांव में डालकर शौचालय की ओर बढ़ा। रात को कुछ लोग और सवार हुए थे जो रेलगाड़ी के फर्श पर लेटे हुए थे। जैसे-तैसे बचता-बचाता शौचालय तक पहुंचा तो वहां भी लोग जमे हुए थे। नित्यशंका निपटाकर बड़ी मुश्किल से अपनी जगह पहुंचा और बाई के सिहराने खिड़की के पास बैठ गया। बाहर पूर्व दिशा की तरफ हल्की लालिमा का अहसास हो रहा था। अंधेरा कायम रहने की जद्दोजहद में था, लेकिन निश्छल रश्मियां रत थी प्रसारित होने में। हरे भरे खेत पीछे की तरफ दौड़ रहे थे। रेलवे (railway-7) पटरियों के पास कुछ मीटर की दूरी को छोड़कर खेतों की मुंडेर थी। जिसमें कहीं कहीं पानी भरा हुआ दिख जाता। दूर-दूर तक हरे-भरे खेत और उनमें सागवान व चीड़ के पेड़ों की कतार से बंटवारे के बाॅर्डर खिंचे हुए थे। या यूं कहें कि ये संयुक्त परिवार विभाजन के साक्ष्य थे। कहीं कहीं खेतों पर ओस की धुंधली परत भी मन मोह रही थी। हरियाली धरती से प्रफुल्लता के साथ एक कसक थी, हमारे बीकानेर में ऐसा क्यों नहीं होता। बीकानेर में रेलवे (railway-7) लाइन या सड़क से कई किलोमीटर तक एक भी हराभरा खेत नजर नहीं आता, चैमासे को छोड़कर। सांय-सांय करती धूलभरी आंधियों से हर दिन गृहणियों का वास्ता। गाड़ी सरपट दौड़े चली जा रही थी। सुबह के लगभग छह बज रहे थे। कुछ ही देर में गुड़गांव आ गया। चाय-चाय की आवाज से रेलवे (railway-7)स्टेशन गूंज रहा था। केतली व मिट्टी के सिकोरे लेकर वेन्डर डिब्बे में चढ़ गए। पिताजी और बाई भी जाग गए। भाई अभी तक उपर की सीट पर सो रहा था। मैं प्लेटफार्म पर देखने लगा। कई वेन्डर खिड़कियों में झांकते हुए चाय-चाय की आवाज लगा रहे थे।उनकी आवाज में एक लय थी। थोड़ी ही देर में गाड़ी चल पड़ी। अब डिब्बे का माहौल बदल गया। कुछ हरियाणवी भाषा में बतियाते डेली पैसेंजरों की आवाज के कारण भी कई लोगों की नींद खुल गई। दिल्ली कैंट आते ही लोग सामान समेटने लगे। पिताजी ने चद्दरें आदि समेटी। सभी सामान व्यवस्थित कर नग गिने गए। फिर सभी लोग दिल्ली स्टेशन आने के इंतजार करने लगे। क्रमशः

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