railway-6: रेल के पंखे, वो लज्जत-वो स्वाद, आज भी है याद

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धीरे-धीरे धुंधलका गहराने लगा था। अब बाहर ज्यादा दूर तक साफ नहीं दिख रहा था। अल्पांतराल में कभी-कभी चरवाहा नजर आजात, जिसने रेवड़ की क्षुधापूर्ति तक स्वयं को अंधेरे के बावजूद घर लौटने से रोक रखा था। खिड़की में से किंचित गर्दन निकालकर मैंने पटरियों के नजदीक ही जमा ली थी। रेलवे (railway-6) की ओर से खड़े किए गए बिजली के खम्भे भी अब नजर नहीं आ रहे थे। बाहर अंधियारा अब पूरी तरह गहरा चुका था। डिब्बे के अंदर सब लोग बतिया रहे थे। पता नहीं किस बात को लेकर बहस चल रही थी। कभी आवाजें तेज होती तो कभी ठहाके लग जाते। मैं उपर की सीट पर चला गया, जहां चद्दर बिछी हुर्ह थी। गर्मी बहुत थी। एक पंखा नहीं चल रहा था। एक बुजुर्ग बार-बार कोशिश कर रहे थे। मेरे पिताजी खड़े हुए और पेंसिल से पंखे की पंखुड़ियों को घुमाने लगे। एकाध कोशिश के बाद पंखा चल पड़ा। रेलवे (railway-6) के पंखे ऐसे ही चलाए जाते हैं, यह बात भला एक रेल कर्मचारी से कैसे छिपी रह सकती है। उपर की सीट पर एक तरफ जाली लगी हुई थी। मैं कोतुहलवश उसके पार झांकने लगा। जाली के दूसरी तरफ दो भाई-बहन खाना खा रहे थे। कागज पर शायद रोटी-सब्जी थी। देखकर, मुझे भी भूख लग गई। मैंने बाई से कहा, भूख लगी है। बाई ने भाई को भी उपर भेज दिया। बाई ने एक थाली में परांठे, तले हुए आलू , बेसन लिपटी हरी मिर्च, कैरी का अचार और भुजिया परोस कर दे दिए। चलती रेलगाड़ी में उपर की सीट पर आमने-सामने बैठे हम दोनों भाई शाही अंदाज में भोजन ग्रहण कर रहे थे। सच कहूं, परांठे के साथ तले आलू पर बुरके हुए नमक-मिर्च, टाटरी की लज्जत, अचार-हरी मिर्च और भुजिया का वैसा स्वाद आजतलक नही महसूस किया। कुछ यादें बचपन की अमिट व अविस्मरणीय होती है। हालांकि मैं कई रईसों के समारोह में शामिल हुआ हूं और अनगिनत आयटमों वाली शादियां देखी है। लेकिन उस रात का वह जायका आज भी जेहन में हैं और वो सौंधी-सौंधी महक मेरे नथुने अब भी महसूस कर सकते हैं। हम बतियाते-खाते रहे। मुंह में निवाला चबाते समय नजरे जाली के पार चली जाती और ये देखते कि पड़ोस में क्या-क्या खाया जा रहा हैं। भोजन के बाद हमने सांप-सीढ़ी खेलने लगे। खेलते-खेलते थक गए तो विपरीत दिशा में मुंह करके सो गए। मैं काफी देर तक रेलगाड़ी की छत और रेलवे (railway-6) की सौगात उन पंखों को निहारता रहा।

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