railway-5: चली रेल, सुहानी शाम में दिखने लगे दौड़ते पेड़

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पिट लाइन पर खड़ी ट्रेन के दोनों तरफ प्लेटफार्म बने हुए थे। जमीन से लगभग 3 से 4 फीट उंचाई पर बने इन प्लेटफार्म पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थी और ट्रेन को धोने के लिए थोड़ी-थोड़ी दूर पर पानी के पाइप लगे थे। खेल के दौरान चुपके से इन नलों को चालू कर देखते, पानी आते ही तुरंत बंद कर भाग जाते। हालांकि बचपन में बहुत खेल खेले हैं लेकिन वाशिंग लाइन पर पकड़मपकड़ाई का जो आनंद आया, वह लगभग 48 साल बाद आज भी मेरे मन पर अंकित है। शाम छह बजे इंजन की सिटी की आवाज सुनकर मां ने आवाज दी और हम दोनों भाई डिब्बे के अंदर आ गए। कुछ ही देर में गाड़ी रवाना हुई और वाशिंग लाइन को पीछे छोड़ते हुए बीकानेर रेलवे (railway-5) स्टेशन की तरफ बढ़ चली। मैं खिड़की के पास अभी से जम गया, हालांकि गाड़ी यार्ड से गुजर रही थी। दुल्हनियां की तरह मंथर गति से गाड़ी ने धीरे-धीरे प्लेटफार्म संख्या 1 पर प्रवेश किया। प्लेटफार्म पर काफी लोग खड़े थे। जैसे ही गाड़ी ठहरी, कुछ लोग चद्दर-गमछे लेकर सीट रोकने आ गए। उनके सीट रोकने के बावजूद ज्यादा भीड़ नहीं हुई। लेकिन हमें पहले से देखकर उन लोगों में आश्चर्य मिश्रित ईष्र्या का भाव जरूर जगा होगा। पिताजी प्लेटफार्म पर ही खड़े थे। रेलवे (railway-5) कर्मचारी होने के नाते कुछ अन्य कर्मचारी भी उनसे बतिया रहे थे। धीरे-धीरे कोच में यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी। लगभग एकघंटा बाद इंजन ने लम्बी सिटी दी और गाड़ी चल दी। पिताजी तुरंत अंदर आ गए। कुछ ही देर में रेलवे (railway-5)स्टेशन और शहर पीछे छुट गया। सूर्य अस्ताचल में समा चुका था लेकिन क्षितिज की लालिमा अभी भी सूर्य की मौजूदगी का अहसास करवा रही थी। मई के महीना में शाम सुहानी लगती है, पर इतनी सुन्दर… मैं खिड़की से बाहर झांकता रहा और पेड़ों, खेतों की बाड़, पगडंडियों, धोरों को पीछे भागते हुए देख रहा था। रेवड़िये भेड़-बकरियों को अपने गांव की तरफ ले जा रहे थे। एकाध खेत में कोई व्यक्ति दिखाई देता, वरना सभी ढाणियां वीरान थी। रेल पटरियो सहारे खड़े किए गए बिजली के खम्भों की दौड़ भी अलग आनंद दे रही थी। दूसरी खिड़की से झांकते हुए भाई ने गर्दन बाहर निकाल ली, तब खिड़कियों में लोहे के सरिए नहीं लगे होते थे। पिताजी ने डांट लगाई और हम दोनों सहम कर बैठ गए।

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