railway-4: वर्क मैन्स ट्रेन और वाशिंग लाइन का आनंद

मुझे अच्छी तरह याद है, हम हर साल गर्मी की छुट्टियों में हरिद्वार-ऋषिकेश घूमने जाते थे। तब बीकानेर से हरिद्वार की रेल यात्रा वाया दिल्ली-सहारनुपर-रूड़की होकर की जा सकती थी। 1972 में मेरी पहली रेल यात्रा मुझे आज भी याद है। यात्रा से एक दिन पहले हमें बताया गया कि कल रेलगाड़ी में चलना है। अपनी जरूरी चीजों की सूची बना लो। मैं और मेरी मां ने एक कागज पर पेंसिल से जरूरी चीजों के सामान लिखे-कामिक्स, नंदन, पराग, चंदा मामा,ताश, दंत मंजन, साबुन, स्टोव, तेल, मसाले, गमछा, कपड़े, चिल्लर आदि। हालांकि पैकिंग के समय सूची वाला कागज उपेक्षित ही रहा और पिताजी स्वयं सूटकैस, पीम्पों व बिस्तरबंद में पैकिंग करते रहे। अगले दिन हम लालगढ़ से शाम 4.35 बजे चलने वाली वर्क मैन्स ट्रेन पकड़ने के लिए लालगढ़ स्टेशन पहुंच गए। यह वर्क मैन्स ट्रेन रेलवे (railway-4) वर्कशाॅप और लोको रनिंग शैड में काम करने वाले रेलवे (railway-4) कर्मचारियों के लिए संचालित की जाती थी। अवकाश को छोड़कर यह ट्रेन प्रतिदिन बीकानेर से सुबह 6.55 बजे रवाना होती थी और चाैैैैैैखूंटी फाटक से कुछ पहले (नूरानी मस्जिद के पास) ठहरती। शहरी क्षेत्र के रेलवे कर्मचारी वहां से वर्क मैन्स ट्रेन में सवार हो जाते और लगभग 7.10 बजे यह ट्रेन लालगढ़ रेलवे (railway-4) अस्पताल के सामने (सिग्नल पर) रूकती। कर्मचारी यहां से उतरकर पैदल ही रेलवे वर्कशाॅप चले जाते। शाम को वापसी में 4.35 बजे यह ट्रेन लालगढ़ से चलती। रेलवे अस्पताल के सामने वर्कशाॅप से छुट्टी करके आए कर्मचारियों को लेकर चाैैैैैैखूंटी के पास छोड़ती हुई बीकानेर चली जाती।

बिना टीटी की इस ट्रेन में पुरानी रेलवे काॅलोनी और लालगढ़ स्टेशन के दोनों तरफ शनैः शनैः विकसति हो रही रामपुरा बस्ती व सुभाषपुरा के लोग भी इसमें बैठकर जरूरी काम से बीकानेर तक जाते। मैं, बड़ा भाई, पिताजी, बाई (मां) और उनकी गोदी में छोटा भाई सब वर्क मैन्स ट्रेन में सवार हो गए। कुछ ही देर में हम बीकानेर स्टेशन पहुंच गए। तब दिल्ली मेल शाम 7.05 बजे चलती थी। पिताजी हमें प्लेटफार्म से सीधे वाशिंग लाइन ले गए। वहां दिल्ली मेल की सफाई हो चुकी थी। हमें जनरल के डिब्बे में बैठा दिया गया और पिताजी कुछ काम से वापस चले गए। शाम 7 बजने में अभी दो घंटे बाकी थे। मैं और बड़ा भाई वाशिंग लाइन पर खड़ी ट्रेन में खेलने लगे। एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में दौड़-भाग करने लगे। वाशिंग लाइन के प्लेटफार्म पर पूरी ट्रेन की लम्बाई नाप ली। इसी गाड़ी में लगे स्लीपर और एसी के डिब्बे देखकर हम दंग रह गए। चुंकि वहां कोई नहीं था तो हम दोनों भाई स्लीपर और वातानुकूलित डिब्बों के अंदर का भी नजर देख आए।