Railway-3 : मीटरगेज रेलगाड़ियों में रिश्तों की बुनियाद

रेलवे (Railway-3) पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता है। अगर यूं कहें कि रेलों में भारत बसता है,…… नहीं चलता है, तो कोई बड़ी बात नहीं है। पूरे भारत में लगभग 14 हजार रेलगाड़ियों में हर दिन सवा करोड़ से ज्यादा लोग यात्रा करते हैं। रेलवे (Railway-3) का स्वरूप बदलता जा रहा है। गुजरे जमाने में रेल यात्रा सुखद यादगार होती थी। रेलवे (Railway-3) में पहले अधिकांश रेलगाड़ियां मीटरगेज की थी और इनमें भी जनरल कोच ज्यादा होते। 14 से लेकर 18 कोच तक की रेलगाड़ी में दो या तीन स्लीपर और एक एसी कोच। अगर आपको याद है तो 80 के दशक तक एसी कोच के लिए खिड़कियों में खस के टाटे लगाए जाते और पाइप की सहायता से उन पर पानी छोड़ा जाता। टाटे भीगने पर ठण्डी हवा देते। वैसी ठण्डी हवा तो आज के एसी भी नहीं देते। कई बार कूप्पे में इतनी ठण्ड हो जाती कि एसी का पानी बंद करवाना पड़ता था। वैसे एसी श्रेणी के डिब्बों में यात्रा करने वाले अलग ही दुनिया के लोग होते थे। स्लीपर में गिने-चुने लोग अग्रिम आरक्षण का लाभ लेेते जिनमें अधिकांशतया व्यापारी या बणिया वर्ग के लोग शामिल थे।

इन सबसे उलट जनरल के डिब्बों की यात्रा का आनंद ही अलग था। रेलगाड़ी के स्टेशन पर पहुंचते ही जगह रोकने की आपाधापी। भीड़ में घुसकर जैसे ही चद्दर बिछा कर जगह रोक ली जाती तो चेहरे पर विजयी मुस्कान का भाव तैर उठता। सफर शुरू होने के बाद गाड़ी के साथ रिश्तों की बुनियाद भी स्पीड पकड़ती जाती। यात्रा के कुछ ही घंटो बाद माहौल ऐसा बन जाता कि नई दुल्हन अनजान बुजुर्ग यात्री से भी घुंघट निकाल कर पूरा मान-सम्मान देती। तब रेलगाड़ी में हर कोई ताश की गड्डी साथ लेकर चलता था। यह प्रचलन था। बैठने वाली दोनों बैंच के बीच पींपा, सूटकेस या कोई गत्ते का डिब्बा रखकर ताश खेली जाती। ऐसा हर कूप्पे में होता था।

भोजन के समय अचार, सब्जी, नमक, नीम्बू का आदान-प्रदान पूरे आत्मीयता से किया जाता। बहुत ही मानमनुहार के साथ परांठा दिया जाता तो सामने वाला भी पूड़ी लेने का आग्रह करता। तब जहरखुरानी के बारे में कोई जानता भी नहीं था। तब विश्वास पर खंजर चलाने का रिवाज नहीं था, गोया कि अपराधियों के भी उसूल हुआ करते थे। मंजिल पर पहंुचने के बाद कानों के अंदर से कोयले के बारीक टुकड़े निकालने का चलन अब कहां। कोयले के धुंए से हाथों में कालिख जम जाती, कपड़ों पर कोयलों का असर साफ नजर आता। घर पहंुंचते ही सबसे पहले स्नान होता था।उसके बाद भी अगले दो तीन दिन तक सफर की खुमारी और यात्रा वृतांत का वर्णन जारी रहता। मीटरगेज की यात्रा का असीम सुख अब कहां, चाहे वन्दे भारत हो या तेजस।