railway-15 : मनसा देवी मंदिर से गंगा की सहस्त्र धाराओं को नमन

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हरिद्वार दर्शन में सबसे पहले मनसा देवी मंदिर के लिए रवाना हुए। मनसा देवी का प्रसिद्ध मंदिर हरिद्वार शहर से लगभग 3 किमी दूर शिवालिक पहाड़ियों की श्रंखला के बिलवा पहाड़ पर स्थित है। यह जगह एक तरह से हिमालय पर्वत माला के दक्षिणी भाग में स्थित है। रेलवे (railway-15) स्टेशन से कुछ दूरी पर पैदल मार्ग था। मंदिर जाने के लिए बस यही एक रास्ता था। हम उसी मार्ग से रवाना हुए। थोड़ी-थोड़ी दूर में सीढ़ियां भी बनी हुई थी। कुछ ही उंचाई पर पहुंचे तो नीचें रेलवे (railway-15) की पटरियां दिखाई दी। जिस पहाड़ी पर हम चढ़ रहे थे, उसी के नीचे से सुरंग थी जिसके अंदर रेलवे (railway-15) ने पटरियां बिछा रखी थी। हम अपने पथ पर आगे बढ़ चले।

रास्ते में कुछ लोगों ने जमीन पर कपड़ा बिछाकर दुकानें भी लगा रखी थी। इन दुकानों पर चने, मुंगफली दाने, केले, संतरे, पापड़-खीचीये, चावल से बने फिंगर रोल, मनिहारी का सामान और नारियल-प्रसाद आदि बेचे जा रहे थे। पिताजी ने प्रसाद के साथ चने, केले और फिंगर रोल खरीदे। हम दोनों भाइयों ने फिंगर रोल को अंगुलियों में फिट किया और चढ़ाई के साथ-साथ खाते जा रहे थे। रास्ते में कई स्थानों पर बंदरों के झुण्ड दिखाई दिए। लोग उन्हें चने-केले आदि दे रहे थे। पिताजी ने भी बंदरों को केले दिए। मैंने पिताजी से लेकर चने बंदरों की तरफ फेंके। बंदर बहुत ही अनुशासित थे। खाने-पीने की चीज लेने के बाद पक्की सीढ़ियों के पास बनी रैलिंग व दीवार पर जा बैठते। कई जगह रास्ता कच्चा और उबड़खाबड़ था। बारिश के समय फिसलन हो जाती थी। हालांकि सरकार का हरिद्वार से मनसा देवी मंदिर तक पूरे रास्ते में पक्की सीढ़ियां बनाने का प्रस्ताव था, लेकिन यह अभी तक पूरा नहीं हो सका था। सरकारें प्रस्ताव बनाती है लेकिन मूर्त रूप देने में बरसों गुजर जाते है।

रास्ते में हमने कई जगह पानी पीया-विश्राम किया। बादलवाही से मौसम सुहावना था और कुछ देर पहले ही झिरमिर हुई थी। मंथर गति स चल रही शीतल बयार में अभी भी पानी की बारीक बूंदे चेहरे से टकरा रही थी। एक पेड़ पर ताड़पत्री बांधकर उसके अंदर लगी ं चाय की थड़ी दिखाई दी। वहां रखे बड़े बड़े पत्थरों पर बैठकर हम सभी ने अदरक-लौंग की चाय का स्वाद लिया। कुछ ही देर में हम मंदिर पहुंच गए। 40 गुणा 40 फीट के चबूतरे के एक कोने में मंदिर था। चबूतरे के चारों तरफ केसरिया रंग के पाइपों की रैलिंग थी। मंदिर से पूरा हरिद्वार नजर आता था। उत्तर दिशा में गंगा नदी का पाट और उसकी लम्बाई नजर आ रही थी। आसमान में छाई काली घटाएं और इस पहाड़ी से दूर-दूर तक नजर आती गंगा की सहस्त्र धाराएं हरे-भरे उपवन के दृश्य को विहंगम कर र ही थी। ऐसा लग रहा था जैसे हरे-भरे खेतों में सिंचाई के लिए नालियां पानी से भरी हो। हमने गंगामैया का प्रणाम किया। मंदिर में ज्यादा भीड़ नहीं थी। इक्का-दुक्का लोग दर्शन के लिए आ रहे थे। लगभग आधा घंटा रुकने के बाद हमं नीचे लौट चले। ढलान के कारण उतरने में मजा आ रहा था। क्रमशः

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