railway-12 : हरिद्वार की बीकानेर धर्मशाला में पकड़मपकड़ाई

railway-12

ज्वालापुर से ट्रेेन की रवानगी के साथ ही लोगों ने सामान समेटना शुरू कर दिया। सामान निकलने के बाद मैंने सीट के नीचे से चप्पलें निकाली। कुछ ही देर में हरिद्वार रेलवे (railway-12) स्टेशन आ गया। पीम्पा, सूटकैस, बिस्तर,पिताजी ने उठाया, कुछ भारी सामान बाई ने। केतली, थैले और कुछ हल्के नग मैं और भाई उठाकर पिताजी के पीछे-पीछे चल दिए। रेलवे (railway-12) स्टेशन के बाहर ही कुछ पण्डे खड़े थे। उन्होंने पूछना शुरू किया, कौन जात, कौन गोत्र कौन गांव….पर पिताजी सभी को भ्रमण का उद्देश्य बताते हुए आगे बढ़ते रहे। पिताजी हमें सीधे बीकानेर धर्मशाला ले गए। हरिद्वार में बीकानेर का नाम इसी धर्मशाला की बदौलत था। दूसरी मंजिल पर हमें कमरा मिल गया। हालांकि कमरा साफ था, फिर भी बाई ने झाडू़ लगाया और दरी बिछा दी। अलमारियों में सारा सामान व्यवस्थित कर रख दिया गया। पिताजी ने मुझ कहा, चलो अपन पानी ले आते हैं। मैंने केतली उठाई और पिताजी की अंगुली पकड़कर चल दिया। धर्मशाला के कार्यालय से विपरीत अंतिम कमरे के पास पानी की टूंटी लगी हुई थी। मैं केतली भर लाया। तभी रामकिशोर महापात्रा भी वहां पहुंच गए। बीकानेर के कुछ और लोग भी आ गए थे। हम कमरे की तरफ बढ़ चले। तब तक बाई ने थाली परोस दी थी। परांठों की जगह पूरियां थी और आलू की सूखी सब्जी के स्थान पर कैरी का अचार, भुजिया और सक्करपारे थे। रेलवे (railway-12)स्टेशन पास होने से ट्रेनों की सिटी सुनाई दे रही थी। भोजन के बाद सभी सो गए। थकान होने के कारण जल्दी ही सबको नींद आ गई।

भोर में सब जल्दी उठ गएं। सुबह का मौसम सुहावना था। आसमान में बादल छाए थे। मैं और भाई धर्मशाला में नीचे बने चैक पर आ गए। धर्मशाला तीन मंजिला थी। जाली-झरोखेदार गलियारे सुन्दर लग रहे थे। हम धर्मशाला में घूमने लगे। ूपर जाने के लिए कई जगह सीढ़िया बनी थी। हम एक सिरे से चढ़ते और गलियारे के दूसरे कोने तक दौड़ लगाते हुए नीचे उतर जाते। खेल-खेल में पूरी धर्मशाला की लम्बाई-चैड़ाई नाप ली। बचपन में धर्मशाला की दौड़कूद आज भी मेरे मस्तिष्क पर अंकित है। तभी पिताजी और बाई भी नीचे आ गए। हम सभी धर्मशाला से बाहर निकले और अपर रोड से रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ चले। कुछ दूरी पर एक स्टाल पर रुके और सब ने चाय पी। चाय के साथ फैन का स्वाद मुझे आज भी याद है। हालांकि ये फैन मैंने पहली बार खाए थे। बाद में जब भी दिल्ली जाते गए तो पुरानी दिल्ली रेलवे (railway-12)स्टेशन के बाहर सरदारजी की थड़ी की चाय पीते, साथ में उनके फैन का मुकाबला नहीं। क्रमश