railway-11 : रईसजादों की अय्याशी का अड्डा ज्वालापुर

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रुड़की रेलवे(railway- 11) स्टेशन के प्लेटफार्म पर लगभग आधा घंटा विश्राम के बाद इंजन ने लम्बी सिटी दी। दूसरी सिटी के बाद ट्रेन चल पड़ी। फायरमैन ने कोयल झौंका। इंजन ने एक साथ काला धुंआ उगला तो चक्के अपने स्थान पर ही घूम गए। दोपहर ढलने लगी थी। शाम के समय डूबते सूर्य की किरणें पेड़ों के झुरमुट से छन-छन कर आ रही थी। कोयल-शुक के वार्तालाप से अमराइयां गंुंजायमान थी। मई के महीने में आम के पेड़ों पर मंजर-बौर नजर आने लगे थे। किसी-किसी पेड़ पर कैरियों की बहार थी। आम के पेड़ों पर कैरी के बीच एकाध पीला-पीला पका आम भी नजर आ जाता। लगातार पीछे दौड़ रहे पेड़ों पर मै अपलक था। जी कर रहा था कि हाथ लम्बा कर आम तोड़ लूं और सारे यात्रियों में बांट दूं। सभी वाह-वाह करेंगे। पर यह कल्पित था। जामुन के पेड़ अब काले-काले नजर आने लगे थे। ट्रेन की पटरियों की आवाज कई बार तेज कभी धीमी हो जाती। रेलवे (railway- 11)ने थोड़ी-थोड़ी दूर में छोटे-छोटे पुल बना रखे थे। मैंने महसूस किया कि नाले के लघु पुल आने पर कुछ पलों के लिए साउंड बदल जाता। नदियों में गर्मी के बावजूद पानी भरा था, छोटे छोटे नाले भी सूखे नहीं थे। शाम के समय हवा में शीतलता प्रवाहित हो रही थी। क्षितिज की लालिमा मंद पड़ने लगी थी। अंधेरा डिब्बे में घिर आया था। ट्रेन ज्वालापुर रेलवे (railway- 11)स्टेशन पर पहुंचते ही लग गया कि हम हरिद्वार क्षेत्र में प्रवेश कर गए हैं। अब चार किलोमीटर दूर ही हरिद्वार था। यू ंतो ज्वालापुर हरिद्वार से ही जुड़ा हुआ है। पर इस छोटे से कस्बे की तासीर अलग है। हरिद्वार में लहसुन-प्याज पर प्रतिबंध है। ज्वालापुर में सब मिलता है। यहां एक से बढ़कर एक रेस्टारेंट हैं जहां विभिन्न वैरायटियों में नाॅनवेज उपलब्ध है। लगभग 30-40 तरह के चिकन की डिशें यहां हर दूसरे-तीसरे रेस्टोरेंट की मैन्यू की शोभा है। देसी-विदेशी शराब के यहां बार हैं। पब संस्कृति की शुरुआत बैंगलौर से हुई थी लेकिन ज्वालापुर में 1972 में ही पैग सिस्टम था। उस जमाने में पूरे भारत के गिने-चुने ही ऐसे शहर थे जहां वोदका-जाॅनी लीवर मिलती थी, उनमें ज्वालापुर भी था। कहते हैं हर की पौड़ी से मात्र पांच किलोमीटर दूर इस छोटे से कस्बे में अय्याशी की हर सुविधा थी। कैसिनों से लेकर गैमिंग क्लब तक। हरिद्वार के सेठों व पण्डों के रईसजादे यहां दाव लगाने आते। उस समय भी यह कस्बा आधुनिक अट्टालिकाओ से आच्छादित था। आज भी जो चीज आपको हरिद्वार में नहीं मिलेगी, वो ज्वालापुर में आसानी से मिल जाएगी।

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