Railway-1: भारत में रेल की शुरूआत रोमांचक यात्रा से कम नहीं

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भारतीय रेल का सफर
रेल भारत की जीवन रेखा है। हर भारतीय के जेहन में कभी न कभी की गई रेल यात्रा का रोमांच जीवंत है। हर किसी का बाल मन अपनी पहली रेल यात्रा को लेकर रोमांच से भरपूर है। भारत में रेल की शुरूआत से लेकर अब तक इसके विकास का सफर भी किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं है। रेलवे (Railway-1) के चरणबद्ध विकास की यात्रा हम यां शुरू करने जा रहे हैं। इस यात्रा में हम आपको रेलवे (Railway-1) के आदि से लेकर अंत तक अद्यतन की जानकारी देंगे। रेलवे (Railway-1) को लेकर मैं काफी रोमांचित रहा हूं। इसके दो कारण है- एक मेरे पिताजी रेलकर्मचारी रहे हैं। दूसरे राजस्थान पत्रिका में रिपोर्टर की हैसियत से मैंने बरसों तक रेलवे (Railway-1) के कामकाज को नजदीक से परखा है। मेरे पिता स्व. बद्री प्रसाद जी रेलवे में फायरमैन थे। 60 के दशक में तब फायरमैन ही काॅलबाॅय का काम करते थे। 1968 में सर्दियों की एक देर रात उनके लिए कहर बनकर टूटी। ड्राइवर को काॅल करने के बाद मध्यरात्रि के बाद करीब 1 बजे वे एक चाय के ढाबे पर पहुंचे और चाय बनाने के लिए कहा। उनके साथ एक अन्य कर्मचारी था जिसने पिताजी को ढाबे के बाहर आकर बैठने को कहा लेकिन वे बोले कि कुछ देर भट्टी पर हाथ सेंक लेता हूं। तभी ढाबे के पास ही शराब के एक ठेके से कुछ आवाजे आने लगी। वहां शराब पी रहे दो तीन ट्रक के ड्राइवरों व खलासियों में झगड़ा हो गया। उनमें से एक चालक भागकर अपने ट्रक में चढ़ा और उसे स्टार्ट किया। ट्रक ढाबे के सामने उल्टी दिशा में खड़ा था, यानी ट्रक का पिछला हिस्सा ढाबे के सामने था। शराब के नशे में चालक को पता ही नहीं चला कि ट्रक आगे जाने के बजाए बैक(पीछे की तरफ) चल पड़ा और सीधा ढाबे के अंदर प्रवेश कर गया। ढाबे के परखच्चे उड़ गए और वहां भट्टी पर हाथ सेक रहे मेरे पिताजी भी उसकी चपेट में आ गए।

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