push pull system : ट्रेन स्पीड बढ़ाने की नई टेक्नोलोजी

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-श्याम मारू-
बीकानेर। भारतीय रेलवे नित नए प्रयोग कर रहा है। वैश्विक स्तर पर मुकाबला करने के लिए बुलेट ट्रेन चलाने पर काम चल रहा है। तो रेलगाड़ियों की गति बढ़ाने के लिए नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं। इनमें नवीनतम तकनीकी है पुश-पुल (push pull system)। भारतीय रेलवे अब पुश-पुल टेक्नोलोजी (push pull system) अपनाकर ट्रेनों की स्पीड बढ़ा रहा है। इसके परिणाम भी मिलने लगे है। पुश-पुल टेक्नोलोजी (push pull system) से भारतीय रेलों की स्पीड 130 किलोमीटर प्रतिघंटा हो गई है। भारतीय रेल प्रशासन का देश की रेल पटरियों पर प्रत्येक ट्रेन की गति 225 किलोमीटर प्रति घंटा करने का लक्ष्य है।

क्या है पुश-पुल टेक्नोलोजी

पुश-पुल टेक्नोलोजी में रेलगाड़ी चलाने के लिए दो इंजन लगाए जाते हैं। ट्रेन के आगे और पीछे, दोनों तरफ। इससे ट्रेन की गति बढ़ जाती है। आगे वाला इंजन अपनी पूरी ताकत से ट्रेन को खींचता है। दूसरा इंजन पीछे से धक्का लगाता है। इसका प्रयोग करके देखा गया तो काफी उत्साहजनक परिणाम मिले। पहाड़ी क्षेत्र में मैदानी इलाकों की अपेक्षा ज्यादा फायदा मिला। खासकर चढ़ाई के दौरान पीछे वाले इंजन से ट्रेन को चलाने में काफी मदद मिली।

कहां हो चुका है प्रयोग

पुश-पुल टेक्नोलोजी का भारतीय रेलवे में सबसे पहले पहाड़ी क्षेत्रों में चढ़ाई के लिए ट्रेन के पीछे इंजन लगाकर प्रयोग किया गया। लेकिन ये प्रयोग मांग के आधार पर ही किया जाता था। यानि किसी खण्ड में ट्रेन चढ़ाई के दौरान खड़ी हो गई तब अतिरिक्त इंजन भेजकर पीछे से धकेला जाता। लेकिन अब इसे व्यवस्थित और सभी रास्तों पर इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई। इसका सबसे पहले प्रयोग पिछले साल 7 अक्टूबर 2018 को दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से मुम्बई के बान्द्रा टर्मिनस तक किया गया। पीछे से इंजन लगाने के बाद इस खण्ड पर यह पाया गया कि इस टेक्नोलोजी से इन दोनों स्टेशनों के बीच सफर में 83 मिनट कम लगे। इसके बाद 13 फरवरी 2019 को मुम्बई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस से हजरत निजामुद्दीन तक चलने वाली सीआर गाड़ी संख्या 22221 राजधानी एक्सप्रेस में इस टेक्नोलोजी का इस्तेमाल किया गया। इसमें सफर का लगभग 95 मिनट कम लगे। अब भारतीय रेलवे दोनों टेक्नोलोजी होने का फायदा उठाने की समीक्षा की गई है। विदेशों में इस टेक्नोलोजी का कई बार इस्तेमाल किय गया। फ्रांस के टीजीवी सिस्टम, यूरो स्टार, अमेरिका की एसेला ट्रेन और पश्चिमी देशों में कई ट्रेनों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।

मालगाड़ी में भी हो चुका है प्रयोग

साथ ही यह तकनीक पहाड़ी इलाकों में तो काफी उपयोगी है। इस तकनीक से ट्रेन आसानी से पहाड़ों पर चढ़ सकेगी। खासकर मालगाड़ियों के लिए। इसके लिए रेलवे ने मालगाड़ी पर प्रयोग करके देखा। दक्षिण पूर्वी रेलवे के चक्रधरपुर डिविजन के बंडामुंडा सेक्शन पर मालगाड़ी के दोनों दिशाओं में इंजन लगाकर इसे चलाया गया। इस खण्ड में चढ़ाई होने के बावजूद किसी तरह की कोई परेशानी नहीं बल्कि अपेक्षाकृत ज्यादा आसानी से परिचालन हुआ। बंडामुंडा सेक्शन दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर मंडल में है। उत्तर दिशा में यह रांची और हटिया को जोड़ता है। जबकि पूर्व दिशा में चक्रधरपुर को जोड़ता है। बंडामुंडा सेक्शन में पुश व पुल तकनीक से मालगाड़ी का ट्रायल के तौर पर परिचालन किया गया है। यह पूरी तरह सफलतापूर्वक किया गया है।

बरसात में भी कारगर

बरसात के दिनों में भी यह तकनीक काफी कारगर साबित होने की बात कही जा रही है। बारिश की बूदों के कारण चढ़ाई के दौरान ट्रेन का चक्का स्लिप हो सकता है। पहले कई बार पहाड़ी क्षेत्रो में बरसात के दौरान अचानक ब्रेक लगाने की स्थिति में ट्रेन पीछे लुढ़कने लगती। या फिर चढ़ाई के दौरान ट्रेन खड़ी हो सकती है। ऐसे में सेक्शन ब्लाॅक हो जाए तो यातायात बाधित हो सकता है। पुल-पुश सिस्टम स्वतः ही इस पर नियंत्रण कर लेता है।

पुश-पुल का उद्देश्य

पुल-पुश सिस्टम का मुख्य उद्देश्य ट्रेन को अधिक एक्सीलेरेशन देना है। इस तकनीकी में ब्रेक भी तेजी से लगता है। पश्चिमी भारत के घाट, पहाड़ियों में सफर सुरक्षित हो रहा है। खतरनाक मोड़ व चढ़ाव के दौरान कई बार ट्रेन पटरी से उतर जाती थी। पुराने सिस्टम मे कसारा या करजत के घाट में पीछे से इंजन जोड़ने के बाद ट्रेन आसानी से चलती थी। बाद में पीछे लगे इंजन को इगतपुरी या लोनावाला में हटा लिया जाता था। इसमें समय लगता था। पुश-पुल सिस्टम में स्पीड कभी भी कम या ज्यादा की जा सकती है। सबसे बड़ी बात दोनों छोर पर लोको मोटिव लगाने से एक साथ नाकाम होने की सम्भावना न के बराबर है।

इनका कहना है

मंजू गुप्ता, अतिरिक्त सदस्य, रेलवे बोर्ड

पुश-पुल टेक्नोलोजी से रेलगाड़ियों की स्पीड बढ़ाई जाएगी। इसका प्रयोग सफल रहा है। लम्बी दूरियों के सफर में 90 से 120 मिनट तक समय घट सकता है। इसका यात्रियों को फायदा मिलेगा। पहाड़ी क्षेत्रों के साथ-साथ पूरे देश में इसे लागू किया जाएगा। साथ ही इससे उर्जा में भी बचत होगी।-मंजू गुप्ता, अतिरिक्त सदस्य, रेलवे बोर्ड