passenger train : शिवालिक पहाड़ियों में गूंजती इंजन की सिटी

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ऋषिकेश तक 23 किमी के सफर में लगे दो घंटे
रेलवे 18
लम्बी
सिटी के बाद ट्रेन चल पड़ी। यह पैसेंजर ट्रेन (passenger train) थी जो हरिद्वार व ऋषिकेश के बीच चैबीस घंट में चार बार आना-जाना करती थी। हरिद्वार और ऋषिकेश (haridwar rishikesh) के बीच मात्र 23 किलोमीटर की दूरी है। सड़क मार्ग से जाने पर एक किलोमीटर का अंतर है। हरिद्वार से अधिकांश लोग टैम्पो या बस से ही ऋषिकेश जाते-आते हैं। चुंकि रेलकर्मी होने के नाते पिताजी ने पैसेंजर ट्रेन (passenger train) को ही वरीयता दी। हालांकि रेलवे (railway) पास भी एक कारण रहा होगा। शाम का समय और आखिरी पैसेंजर ट्रेन (passenger train) होने के कारण भीड़ ज्यादा थी लेकिन इनमें मोतीचूर, रायवाला और वीरभद्र गांवों के लोग भी ज्यादा थे। ट्रेन शिवालिक पहाड़ों के बीच सरपट दौड़ी चली जा रही थी। इंजन की सिटी पहाड़ों से टकराकर वापस सुनाई दे रही थी। हरे-भरे पहाड़ों के बी इंजन से निकलता धुंआ भी मनोरम लग रहा था।

मात्र पांच किलोमीटर बाद ही मोतीचूर स्टेशन आ गया। मोतीचूर रेलवे स्टेशन के पास पेड़ ही पेड़ कटे हुए पड़े थे। भारी संख्या में सफाई के बाद लठ्ठे भी रखे थे। पेड़ों को काटकर साफ कर लठ्ठे बनाकर उनपर नम्बर भी अंकित किए जाते थे। इन लठ्ठों को स्टेशन से कुछ ही दूरी पर बह रही गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। हरिद्वार में सम्बंधित ठेकेदार इन लठ्ठों को रिसीव कर लेता। हालांकि बाद के बरसों में परिवहन की इस व्यवस्था को उत्तर प्रदेश सरकार ने बंद कर दिया था। मोतीचूर रेलवे स्टेशन का दृश्य नयनाभिराम था। ट्रेन यहां लगभग पांच मिनट रुकने के बाद बढ़ चली। संध्याकाल के समय सूर्य की किरणें मद्धिम पड़ने लगी थी। इस इलाके में चीड़, देवदार, सागवान के वृक्षों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा थी। छह-सात किलोमीटर का सफर तय करते ही रायवाला जंक्शन आ गया। यहां से देहरादून और ऋषिकेश के लिए अलग-अलग रेल पटरियां हैं। यहां बड़ी संख्या में डेली पैसेंजर उतरे। हो सकता है कुछ यात्री देहरादून की तरफ जाने वाली ट्रेन में सवार हों।

इसके बाद आया वीरभद्र गांव। इस गांव की दो खासियते हैं। सावन के महीने में भारी संख्या में कांवड़िए इस स्टेशन पर उतरकर गंगा से कांवड़ भरकर वापसी में पैदल रवाना होते है। दूसरी हरिद्वार से ऋषिकेश के बीच हाथियों की काफी संख्या है। खासकर वीरभद्र के आसपास खूब हाथी हैं। कई बार तो ये रेलवे स्टेशन पर आ जाते हैं। रेलवे स्टेशन के आसपास बहुत ही हरियानी थी। कई तरह के जंगली फु ल खिले हुए थे। देखने से ही मन को सुकून मिला। बस अब अगला पड़ाव अंतिम हैं। 23 किलोमीटर का सफर पूरे दो घंटें में तय करने के बाद हमारी ट्रेन ऋषिकेश पहुंची। रेलवे लाइन पर इस रूट का यह अंतिम रेलवे स्टेशन हैं। मात्र एक प्लेटफार्म। हम सीधे नदी किनारे तक पैदल ही पहुंचे। नाव में बैठ कर गंगा पार करनी थी। गंगा के उस पार ही सबसे अधिक मंदिर, धर्मशालाएं और दर्शनीय स्थल है। हालांकि मैं पहली बार नाव में बैठा था, लेकिन बहुत ही मजा आ रहा था। मेरा बार-बार दिल करता था कि झुककर नदी के पानी को छू लूं पर यह मुमकिन नहीं हो सका। क्रमशः