indian rail :167 सालों का टूटा इतिहास , पहली बार पूरे चक्के जाम

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भारतीय रेल (indian rail) स्थापना दिवस
-श्याम मारू-
बीकानेर।
भारत में रेलवे को आज 167 साल पूरे हो गए है। डेढ़ सदी से भी ज्यादा समय से रेलवे के कर्णधारों को ही नहीं बल्कि इस देश के करोड़ों नागरिकों को भी ऐसा लगता था कि भारतीय रेल (indian rail) कभी बंद नहीं हो सकती। मुम्बई की लोकल ट्रेन को बाॅम्बे की लाइफ लाइन कहा जाता है। यह रुक गई तो मुम्बई थम जाएगी। पिछले 23 दिनों से रेल बंद है और अगले 17 दिन तक और बंद रहेगी। कुल मिलाकर कम से कम 40 तक रेल के चक्के जाम रहेंगे। यदि स्थितियां नहीं सुधरी तो यह अवधि और आगे भी बढ़ सकती है। कोरोना वायरस के सामुदायिक प्रसार को रोकने के लिए केन्द्र सरकार ने 25 मार्च को 21 दिन का लाॅक डाउन घोषित किया था। इसके बाद दूसरे चरण में लाॅक डाउन की अवधि 3 मई तक बढ़ा दी गई है। केन्द्र सरकार के फैसले के साथ रेलवे ने भी हाथों हाथ रेलगाड़ियों का संचालन रोकने का फैसला किया और सभी यात्री गाड़ियों को स्थगित कर दिया। इनमें मेल, एक्सप्रेस, राजधानी, शताब्दी, दुरोंतो समेत सभी पैसेंजर गाड़ियां शामिल हैं। मुख्य बात यह है कि इतिहास में कभी भी भारतीय रेल (indian rail) के चक्के थमे नहीं। वर्ष 1974 में हुई ऐतिहासिक हड़ताल के तीन सप्ताह के दौरान भी रेल पूरी तरह बंद नहीं हुई। तब भी देश के कुछ हिस्सो में रेल का संचालन जारी रहा।

भारतीय रेल (indian rail) की स्थापना

भारत में आज ही के दिन यानी 16 अप्रेल 1853 को रेल की शुरूआत हुई थी। महाराष्ट्र स्थित मुम्बई और ठाणे के बीच 21 मील (लगभग 33.6 कि.मी.) लम्बे रेलमार्ग पर 16 अप्रेल, 1853 को पहली रेल चलाई गई थी। 14 डिब्बों वाली इस रेलगाड़ी को खींचने के लिए तीन लोकोमोटिव इंजन लगाए गए थे जिनके नाम थे- साहिब, सिंध और सुल्तान। 167 साल पहले आज के दिन दुल्हन की तरह सजी धजी इस रेलगाड़ी को देखने के लिए हर कोई लालायित था। गर्वनर के निजी बैंड मधुर स्वरलहरियां बिखेर रहे थे। संगीतमयी धुनों से माहौल खुषनुमा हो गया। दोपहर साढ़े तीन बजे बोरीबंदर से रवाना हुई ठाणे तक पहुंचने में इसे सवा घंटा लगे थे। लगभग 400 अतिविशिष्ट लोगों के लिए यह अनुभव अनूठा था। उस दिन से लेकर बाद में कभी भी रेल के चक्के थमे नहीं।

रेल हड़ताल 1974

बोनस, काम के घंटे और कार्य स्थल पर सुरक्षा समेत अनेक मुद्दों को लेकर सन 1974 में भारतीय रेल के कर्मचारियों ने २० दिन की हड़ताल की थी। इस हड़ताल में लगभग 17 लाख से ज्यादा कर्मचारियों ने भाग लिया था। यह आज तक की ऐतिहासिक व सबसे बड़ी ज्ञात हड़ताल है। इसका नेतृत्व जॉर्ज फर्नांडीज ने किया था। उस समय जार्ज फर्नाडीज इंडियन रेलवे मैन्स फेडरेशन के अध्यक्ष थे। बीस दिन चली इस रेल हड़ताल से भारत में हाहाकार मच गया था। 8 मई 1974 से आरम्भ हुई इस हड़ताल के दौरान सरकार ने हजारों रेल-मजदूरों, ड्राइवरों को गिरफ्तार और जेल भेज दिया। मुख्य बात यह है कि 20 दिन तक चली इस हड़ताल के दौरान अधिकांष ट्रेनें बंद हो गई लेकिन सभी नहीं। देश के कई हिस्सों में रेलगाड़ियों का संचालन जारी रहा था।

बीकानेर रेलवे स्टेशन पर कभी नहीं छाया इतना सन्नाटा

बीकानेर में रेलवे की स्थापना से लेकर कभी भी ट्रेनें बंद नहीं हुई। बीकानेर रियासत में रेलों का विकास की यात्रा 1889 में जोधपुर-बीकानेर रेलवे के संयुक्तिकरण के साथ आरम्भ हुई। रेलवे में कार्य और विकास को लेकर 1924 मे बीकानेर और जोधपुर रियासतों ने अलग-अलग काम आरम्भ कर दिया। इसी के साथ बीकानेर स्टेट रेलवे की स्थापना हो गई। उस समय बीकानेर स्टेट रेलवे का माइलेज के बारे में अधिकृत जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन 1918 में बीएसआर का क्षेत्र 1013 किलोमीटर, 1936-37 में रूट किलोमीटर 1281 थे। इसी प्रकार बीएसआर 1943 तक 1421 किलोमीटर क्षेत्र में रेल परिचालन संचालित कर रहा था। आजादी से पहले और बाद में कई ऐसे अवसर आए लेकिन 96 सालों के इतिहास में कभी भी बीकानेर का रेलवे स्टेशन वीरान नहीं रहा।
वर्ष 1974 में लगभग तीन सप्ताह तक हड़ताल चली थी। उस समय लगभग 80 प्रतिशत रेलगाड़ियों का संचालन नहीं हो रहा था। यह सही बात है कि न तो कभी शतप्रशित रेल रुकी और न ही कभी ऐसा हुआ कि रेल स्थापना दिवस पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ।-अनिल व्यास, मण्डल मंत्री, नाॅर्थ वेस्टर्न रेलवे एम्प्लाइज यूनियन, बीकानेर

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