gantaghar : हर की पौड़ी पर गंगा मैया के साथ भारत दर्शन

railway-13 : हर की पौड़ी पर सुबह ज्यादा भीड़ नहीं थी। वहां बने घंटाघर (gantaghar बिरला टाॅवर) पर लगी घड़ी मुझे खास ही लग रही थी। घंटाघर (gantaghar) के पास ही दरी बिछाकर सामान रख दिया। पिताजी ने हम दोनों भाइयों के समस्त कपड़े खोल दिए, जांघिये को छोड़कर। बाई वहीं बैठी रही सामान की निगरानी में, हम स्नान के लिए गंगाजी में डुबकी लगाने को तैयार हो गए। नदी किनारे घाट बने हुए थे। घाट पर जंजीरे थी, जिन्हें पकड़कर लोग स्नान कर रहे थे। नदी में उतरने से पहले पिताजी ने कहा, कोई भी जंजीर को नहीं छोड़ेगा। जंजीर पकड़कर कदम जैसे ही पानी में डाला, पूरे शरीर में कम्पकम्पी छूट गई। मई के महीने में पानी इतना ठण्डा तो सर्दियों में कैसा होगा। घुटने डूबने ने साथ ही घिग्घी बंध गई। पिताजी ने दोनों भाइयों की कलाइयां पकड़ी और पानी में डुबकी लगा दी। जंजीर और पिताजी का हाथ पकड़ा होने से जैसे सारा डर गायब हो गया। पानी का ठण्डापन भी अब सुहाने लगा। हम डुबकी पर डुबकी लगाए जा रहे थे। हमें बिल्कुल डर नहीं लग रहा था। हम कभी मछली बनकर लम्बे लेट जाते और तैरने का उपक्रम करते। कभी नाक पकड़कर डुबकी लगाते। नदी का पानी भी कभी तेज होता तो कभी धीरे। कभी लहरें हमें खुद उछाल देती तो कभी हम डुबकी लगाते। खूब मजा आ रहा था, डर गायब। यह सब पिताजी के कारण सम्भव हुआ। पिताजी ने हाथ पकड़ रखा था, लग रहा था अब दुनिया की कोई ताकत हमें नहीं डुबो सकती। यह दृढ़ विश्वास था। बहुत देर तक स्नान करते रहने के बावजूद नदी से बाहर निकलने का मन नहीं कर रहा था। हमारे कहने पर कुछ देर स्नान की मुहलत मिल गई।

बाद में पिताजी की आदेशात्मक आवाज सुनकर हम नदी से निकलकर दरी पर जा बैठे। बाई महिलाओं के लिए बने स्नान क्षेत्र में नहाने चली गई। हम कपड़े बदलने लगे। वहीं तेल आदि लगाकर बाल बनाए और धुले हुए वस्त्र पहने। अब भीड़ भी बढ़ने लगी थी। चहल पहल भी तेज हो गई। देश के अलग-अलग भागों से आए लोगों ने दरी-चद्दर, तिरपाल आदि बिछाकर जगह रोक रखी थी। ऐसा लग रहा था जैसे हर की पौड़ी पर घंटाघर (gantaghar) के पास भारत उमड़ आया हो,। खोमचे वाले, फेरीवाले और थड़ी वाले खाने-पीने व अन्य सामान बेच रहे थे। छोटे-छोटे बच्चे भी भिन्न-भिन्न वस्तुएं बेच रहे थे। पिताजी ने एक बच्चे को आवाज लगाई और खीचीये खरीदे। दस पैसे के तीन खीचीये। हमने खीचीयों का खात्मा किया ही था कि बाई भी आ गई। सामान समेटकर हम गंगा मैया के मंदिर में दर्शन के लिए गए। गंगा मैया के मंदिर को छोड़कर शेष सटे हुंए मंदिरों पर रंगरोगन किया हुआ था। सिर्फ गंगा मैया का मंदिर प्राचीन रंगहीन नजर आता था। घंटाघर (gantaghar) के पास से देखने पर महसूस होता था कि मंदिर नदी के बीचो-बीच है, इसमें दर्शन कैसे करेंगे। लेकिन पिताजी हमें ले गए। दर्शन के दौरान बुंजुर्ग पंडितजी पिताजी को बता रहे थे कि कुछ लोग नदी की धारा में गंगा मैया का दूसरा मंदिर भी बनाना चाहते हैं। इन दिनों हरिद्वार में पंडितों के बीच द्वंद्व चल रहा है। बुजुर्ग बोले, क्या गंगा मैया का दूसरा मंदिर बनाना उचित रहेगा। (क्रमशः)