dhramshala : ऋषिकेश के जंगलों में वनभोज का एडवेंचर

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रेलवे 22
शाम
को एक बार फिर बादल घिर आए। घने-घटाटोप बादल काफी सुहावने लग रहे थे। हरी-भरी पहाड़ी के शिखर पर मंडराते ये बादल मुकुट जैसे दिखाई दे रहे थे, मानो पर्वतराज का राज्याभिषेक हो रहा हो। झिरमिर फुहारें गिरने लगी तो बाहर घूमने के लिए जाने का कार्यक्रम कैंसल हो गया। हम कालाी कमलीवाला बाबा धर्मशाला (dhramshala) में ही खेलने लगे। धर्मशाला (dhramshala)के पीछे काफी खुला स्थान था। वहां से गीता भवन व परमार्थ निकेतन के भवन साफ दिखाई दे रहे थे। बाई धर्मशाला (dhramshala)के पिछवाड़े में पत्ते तोड़ रही थी। मैं और भाई भी मदद करने पहुंच गए। देखादेखी मैं भी पत्ते तोड़ने लगा। जमीन पर दूर-दूर तक ऐसी झाड़ियां खूब लगी थी। हमने चुन-चुनकर पत्ते तोड़े। इस टास्क में मजा आ रहा था। बाई ने इन्हें धोकर सब्जी बनाई। उस समय तो समझ नहीं आया लेकिन बाद में पता चला कि वे चंदलोई या चंदळिये के पत्ते थे।

एक दिन पिताजी कैरियां तोड़कर ले आए। उसी की लौंजी बना ली। कैरी की लौंजी हमे इतनी भाई कि एक ही दिन में चट कर डाली। लौंजी बनाने के लिए कैरी को बारिक-बारिक लच्छेदार काटा जाता है और इलायची व मिसरी में नाममात्र के नमक-मिर्च के साथ पकाई जाती है। बच्चों को यह काफी पसंद आती है। बार-बार फरमाइश पर पिताजी हमें साथ ले गए। गीता भवन के पिछवाड़े में आम के खूब पेड़ लगे थे। वहां खूब कैरियां तोड़ी। हमने पूरा एक थैला भर लिया। बाई ने इनमें से आधी की लौंजी बना ली। ऋषिकेश में ऐसा कई बार हुआ जब हाथों-हाथ तोड़कर सब्जी बनाई। हरिद्वार-ऋषिकेश की एक सप्ताह की यात्रा के दौरान परिवार ने तीन या चार बार ही होटल या रेस्त्रां में भोजन किया होगा, बाकी दिनों में तो ताजा बनाकर ही खाया। हालांकि ऐसा नहीं है कि ऋषिकेश में सब्जी की दुकानें नहीं थी, लेकिन अपने हाथ से तोड़कर, साफकर पकाने-खाने का एडवेंचर ही अलग है। एक बार तो हम भ्रमण के दौरान मुख्य रास्ता छोड़कर जंगलों की तरफ निकल गए। एक जगह पर जामुन के घने पेड़ के नीचे दरियां बिछाकर ठिया जमा लिया। पिताजी लकड़ियां बीन लाए और बाई ने पत्थरों से जुगाड़कर चूल्हा चेतन कर लिया। चूल्हे की आग में आलू डाल दिए। सिकाई के बाद आलू छीलने का काम हमने किया। बाई ने नमक, मिर्च, धाणा, आलू मिलाकर आटा गूंदकर परांठे बना लिए। सायं-सायं करते जंगल में जामूनी छाया तले ऐसे परांठों का दही के साथ वनभोज का स्वाद भुलाया नहीं जा सकता। ऋषिकेश के वनक्षेत्र में चंदळिया, हरा धनिया, पुदीना,हरी मिर्च बहुतायात मं उगी हुई थी और हमें जैसे इनका रस्सास्वादन करने की छूट मिली हुई थी। क्रमशः

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